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Thursday, April 4, 2013

Thursday, September 29, 2011

The Rose


छवि साभार: गूगल छवि 

Wednesday, September 28, 2011

What is Love...?

छवि साभार: गूगल छवि 

Monday, September 26, 2011

तेरी दीवानगी

छवि साभार: गूगल छवि 

Friday, September 16, 2011

Sunday, August 7, 2011

सिमटी रहे तू मुझमे



यूँ ही रहना इन बाँहों में,
न जाना दूरकहीं, मेरी 
सोहबत की छाँव से,
न होना दूर कभी |

कि बसती है तू ही 
इन निगाहों में, मेरी  
धड़कन भी है तू ही, 
कोई और नहीं |

मीठा सा अहसास तेरे 
स्पर्श का ओ सनम,
कभी न छूटे साथ तेरा,
सिमटी रहे तू मुझमे यूँही |


- दिनेश सरोज



छवि साभार: Salina Trevino

Monday, July 18, 2011

मेरी नजरें


अब भी नहीं थमा,
वो तेरी और मुड़ जाना
मेरी नज़रों का,

तुझे देखते ही नजरें 
मेरी अब भी
मचल जाती हैं,

फर्क सिर्फ इतना सा है
तब पलकें उठ-उठ कर
तुझे देखा करती थीं,

अब इन आंसुओं को
छुपाने का सब से
जतन किया करती हैं...!

- दिनेश सरोज

Wednesday, July 6, 2011

जो उनके मदहोशी में खोये न होते कभी...!



महसूस न किया होता अपने
दिल की धडकनों को कभी,
उनके दिदार ने धड़कनों को
जो कभी रोका न होता,

बढ़ चले होते संग
कारवां के हम भी,
जो उनके मदहोशी में
खोये न होते कभी...!

- दिनेश सरोज

छवि साभार

Monday, June 27, 2011

इक खुशबू की तलाश में...!


जब थी हसरतें इस दिल में 
ज़ानिब उनके आगोश की,
उड़ती रही वो तितली बन 
महकते फूलों की दरकार में|


हम होश संभाले बैठे ही थे 
कि पतझर का मौसम आया,
देखा फिरते बदहवास उन्हें 
किसी खुशबू की तलाश में|


- दिनेश सरोज
छवि साभार: गूगल छवि 

Monday, January 24, 2011

वफ़ा की मूरत...!

थक के न हार ऐ मुसाफिर,
यूँ बैठ जाने से मंजिल न मिलेगी | 

टूटे हुए कांच के टुकड़ों में,
तुझे सूरत ठीक से न दिखेगी |

तू यूँ ही रोता रहा गर'
किसी की बेवफाई पर,
तो रुन्धाई आँखों से
वफ़ा की मूरत न दिखेगी | 

- दिनेश सरोज
छवि साभार : गूगल छवि

Monday, January 3, 2011

वफ़ा की उम्मीद

याद उनकी जिन्दा रखी है हमने अब भी,
उफ़नते सिने की ज्वाला से बचा कर,
तक़दीर ने छिनना चाहा उन्हें हमसे,
हर टूटती सांस से, बांधे रखा उन्हें हमने,
आरज़ू तो न हुई पूरी पाने की उसे,
फिर भी आस का सिलसिला टूटनें न दिया,
बेवफा भी तो न कह सकेंगे हम उन्हें,
हमसे ही, देर हुई बातें दिल की कहने में,
वफ़ा की उम्मीद तो तभी कर सकते थे हम,
जब जिंदगी में कभी उनके हो पाते...!

- दिनेश सरोज

छवि साभार : गूगल छवि

Friday, November 12, 2010

प्यार में नाम कर जाओगे

प्यार को न तौलो आंसुओं से,
.
जितना बहाओगे प्यार में तुम आंसू,

 .
उतना ही ज्यादा उसे सींचते जाओगे, 
.
करोगे जितना टूट कर मुह्हबत सनम से,
.
प्यार में नाम उतना तुम कर जाओगे |

" दिनेश सरोज " 



छवि साभार : गूगल छवि

Friday, October 15, 2010

आस! इक मिलन कि...

 
दिल्लगी न कर सके कभी,
ना हम कोई खता ही कर सके,
खुमार तो चढ़ा था बहुत पर,
हम तो दिवानगी भी न कर सके|

बेचैन हुए तो खूब फिर भी,
आवाज उन्हें न लगा सके,
कहने को उनसे -
मन में गढ़ी बातें भी ढेरों,
कुछ भी तो उनसे कह न सके|

नज़रें टकराई तो कई बार,
पर नज़र हम मिला न सके,
वो तो खिल-खिलाये -
कई दफा मगर,
हम तो मुस्कुरा भी न सके|

कुछ कदम चले भी इक राह,
इस पर भी हमराह उन्हें -
बना न सके,
आये थे बेहद करीब भी कभी,
पर बात दिल कि कह न सके|

गम करना चाहते थे कभी -
न मिल पाने का उनसे,
फिर मिलने कि इक -
आस के चलते,
कमबख्त वो भी न कर सके|

दिनेश'

छवि साभार: गूगल छवियां 

Wednesday, May 19, 2010

तेरी उस इक झलक नें हमें,
नई कोई राह दिखा दिया,

जिंदगी से भागते फिरते रहे,
नई इक आस जगा दिया,

कहीं मेहरबान मुझ पर,
अब फिर से खुदा तो नहीं,

पहले दिल में मेरे और अब,
तुम्हें मेरी आगोश में ला दिया!

@  दिनेश सरोज

Thursday, August 6, 2009

गम-ऐ-मुहब्बत

"गम-ए-मुहब्बत हमें भी था -
और शायद उन्हें भी...

दिल का लगाना खेल तो नहीं था -
मुहब्बत उनसे आज भी है...

आज दूर ही सही हमसे फिरभी -
वो हमारे जज्बात में तो है..."

@ Dins'

Thursday, March 19, 2009

कशिश


एक होड़ सी लगी रहती है -
समंदर की लहरों में सदा,
रहतीं हैं सदा वे कश्म-कश में,
की हममें से कौन चूमेगा -
निराले साहिल को सबसे पहले!
अपनी मौजों में वे मस्त -
रहती हैं सारी राह,
अक्सर ही रहतीं हैं डूबी हुई,
ख्यालों में सुहाने ...
मिलन वो होगा कैसा उनके साथ?
राह भर करती रहती है अठखेलियाँ,
नहीं करती परवाह वे उन -
आँधियों का अक्सर जो,
बदल देना चाहते हैं उनके राहों को...
जानती हैं बखूबी वे, की मिलन -
साहिल से उनका है क्षणिक लेकिन,
कशिश को अपने कम वो कभी,
भी होने नहीं देतीं...

@ Dins'

Sunday, December 28, 2008

जाने कौन है वो!!

दिल में एक तस्वीर सी बनी है,
रब जाने कौन है वो !
मदभरी खुशबू-सी है आती,
जब जहन में है आते वो !
अरे! ये कैसी तरंग है फ़िज़ाओं में,
सिर्फ उन्हीं का अह्सास होता है !
दिल जान से हैं चाहते उन्हें हम फिर भी,
ना जाने क्यों वो हमें तड़पाता है ! ! !

@ Dins'

चाहत !!!

भटकती रहती है नजरें जाने किसे ढुंढने को,
और एक वो है कि कोई इशारा ही नहीं करता !!!
इंतेहां ले रहा है जाने कब से हमारे सब्र का,
वो बेदर्द है इतना की हमें दीदार ही नहीं देता !!!
थक तो गई है जरुर मेरी आँखें ए दोस्त,
उनसे मिलने की चाहत अब भी बरकरार है !!!
चाहे लाख तड़पाये वो हमें अपनी चाहत में,
हम अपना हौसला कभी ना छोडेंगे,
उन्हें पाकर ही ये दम तोडेंगे !!!
उन्हें पाकर ही ये दम तोडेंगे !!!
उन्हें पाकर ही ये दम तोडेंगे !!!

@ Dins'

भूल नहीं सकता!!!

भूल नहीं सकता कभी कोइ,
-
अपने दिल-ए-गुलज़ार को,
-
उनके नशिली आवाज़ को,
-
उनके मासूम इकरार को,
-
उनके हंसी अन्दाज़ को,
-
उनके प्यारी मुश्कान को,
-
उनके सुहाने एह्सास को,
-
उनकी बलखाती चाल को

भूल नहीं सकता कभी कोइ,
अपने आशिक-ऎ-खयाल को..



@ Dins;

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