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Saturday, November 14, 2009

कसौटी


चाहे कितना भी वक़्त गुजार ले,
कोई किसी के संग इक छोटी-सी कसौटी,
खोल देती है सबकी आँखें बंद!
बड़े-बड़े दावे कर लेते हैं साथ निभाने की,
पर इक छोटी सी शंका झंकझोर देती है,
हर मजबूत रिश्तों की बुनियाद!
जिन्हें कभी अपना जाना करते थे,
जिनमें हमारा सारा जमाना था,
फिर अचानक बदल जाता है,
दोस्ती का वो सुहाना अहेसास!
रिश्तों में जाने कहाँ से,
आ जाती है फिर खटास,
पर दोस्ती तो वो है जो कभी,
दिखाई, सुनाई या जतायी नहीं जाती,
दोस्ती तो बस निभाई और,
बस.. महसूस की जाती है!!!

- दिनेश सरोज'

Tuesday, August 4, 2009

दोस्ती क्या है

दोस्ती होती नहीं दो-चार मुलाकातों से,
ना ही होती ये कुछ-एक ज़ज्बातों से!
औ' न ही प्यार जताने से!
दोस्ती क्या है ये तुम खुद जान जाओगे,
जब बंद आँखों में हमें ही पाओगे!


@ Dins'

Thursday, February 26, 2009

~: फुरसत कहाँ :~

गुजर जाते थे लम्हों-पे-लम्हें औ'
हमें वक्त का अंदाज़ ही न चलता था,
पर अब है फुरसत कहाँ जो हम,
वक्त निकालें यारों खातिर|
तब होती थी गुफ्तगू अक्सर -
दिन कट जाते थे बातों ही बातों में,
अब तो महीनों-महीनें गुजर जाते हैं,
औ'हमें फुरसत नहीं पल भर भी-
यारों से एक मुलाक़ात का|


@ Dins'

Saturday, February 14, 2009

अपने-पराये!

मैं मजबूर तो नहीं, लेकिन,
पर हाँ, जरूरतमंद हूँ शायद|
इस बेगैरत दुनिया में,
मैं गैरतमंद हूँ शायद|
मुझे नहीं है आस -
किसी के साथ की,
इन राहों पर चलना -
अकेले,
मैंने सिख लिया है अब|
वो जो अपने थे,
बहुत खास थे,
आज रखते हैं सम्बन्ध -
तो बस व्यवहार भर के लिए|
पराये तो न बदले, पराये थे -
वो अब भी पराये ही हैं|
किन्तु, जो अपने थे कभी -
अब, वो पराये से लगने लगे हैं|
इस संसार में आये थे अकेले,
और अकेले ही तो जाना है|
औ' यहाँ जो मिले-बिछडे सबसे,
यही तो यहाँ का फ़साना है|

@ Dins'