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Thursday, April 4, 2013
Wednesday, March 27, 2013
Thursday, July 21, 2011
मुंबई लोकल
न होगी फिकर तुझे
तेरी जिंदगी की,
तो कोई बात नहीं |
पर चिंता उन्हें तेरी जरुर होगी,
जिन्हें तू घर भूल आया है |
लटकते रहे यूँ ही तो,
जिंदगी भी तेरी लटकती रहेगी |
तेरे चले जाने के बाद,
तेरे अपनों की जान फिर
ताउम्र तड़पती रहेगी |
जी ले जी भर कर संग
अपनों के, कौन जाने
ये जिंदगी फिर रहे न रहे |
- दिनेश सरोज
तेरी जिंदगी की,
तो कोई बात नहीं |
पर चिंता उन्हें तेरी जरुर होगी,
जिन्हें तू घर भूल आया है |
लटकते रहे यूँ ही तो,
जिंदगी भी तेरी लटकती रहेगी |
तेरे चले जाने के बाद,
तेरे अपनों की जान फिर
ताउम्र तड़पती रहेगी |
जी ले जी भर कर संग
अपनों के, कौन जाने
ये जिंदगी फिर रहे न रहे |
- दिनेश सरोज
छवि साभार: गूगल छवि
Friday, July 15, 2011
स्वछंद हो, निर्भय हो उड़ सकूँ...
स्वछंद हो, निर्भय हो उड़ सकूँ,
इस विशाल आकाश औ'
हरित वसुंधरा के बीच,
बस यही तो सोचा था हमने...
फिर सकूँ इन वादियों में,
जी चाहे जहाँ तक, जब तक,
कहीं मुझे कोई रोक-टोक न हो,
संग जुड़े मेरे, जो भी चाहे बिना झिझके...
मेरी बोली, मेरे पहनावे, मेरी रंगत से,
कोई न डरे, न सहमे, न सकुचाये,
कोई गली-मोहल्ला, कोई चौराहा या बाज़ार,
किसी खास तबके का होकर न रह जाये...
दो पल क्यों न सुकून से हम जिएं,
जब कभी राह चलते प्यास लगे,
जो घर सामने पड़े वहाँ पानी पीनें से,
हमारा धर्म, जाती, सोच हमें न रोके...
- दिनेश सरोज
छवि साभार: गूगल छवि
Wednesday, June 1, 2011
Sometimes...!
Sometimes people :
have a lot to say,
but remain silent.
have a lot to share,
but remain closed.
nearly broke to cry,
but manage to hold on.
want to dance like crazy,
but control temptation.
feel to fly high in the sky,
but alas they lack the wing.
- Dins'
Image Source: Google Images
Monday, January 24, 2011
वफ़ा की मूरत...!
थक के न हार ऐ मुसाफिर,
यूँ बैठ जाने से मंजिल न मिलेगी |
टूटे हुए कांच के टुकड़ों में,
तुझे सूरत ठीक से न दिखेगी |
तू यूँ ही रोता रहा गर'
किसी की बेवफाई पर,
तो रुन्धाई आँखों से
वफ़ा की मूरत न दिखेगी |
यूँ बैठ जाने से मंजिल न मिलेगी |
टूटे हुए कांच के टुकड़ों में,
तुझे सूरत ठीक से न दिखेगी |
तू यूँ ही रोता रहा गर'
किसी की बेवफाई पर,
तो रुन्धाई आँखों से
वफ़ा की मूरत न दिखेगी |
- दिनेश सरोज
छवि साभार : गूगल छवि
Monday, January 3, 2011
वफ़ा की उम्मीद
याद उनकी जिन्दा रखी है हमने अब भी,
उफ़नते सिने की ज्वाला से बचा कर,
तक़दीर ने छिनना चाहा उन्हें हमसे,
हर टूटती सांस से, बांधे रखा उन्हें हमने,
आरज़ू तो न हुई पूरी पाने की उसे,
फिर भी आस का सिलसिला टूटनें न दिया,
बेवफा भी तो न कह सकेंगे हम उन्हें,
हमसे ही, देर हुई बातें दिल की कहने में,
वफ़ा की उम्मीद तो तभी कर सकते थे हम,
जब जिंदगी में कभी उनके हो पाते...!
- दिनेश सरोज
छवि साभार : गूगल छवि
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